भगवान परशुराम

भगवान् परशुराम का इतिहास - कौन थे भगवान् परशुराम ?

भगवान् परशुराम जी का पौराणिक परिचय

वैसे तो हमने भगवान परशुराम जी के बारे में बहुत कुछ सुना है। भगवान् परशुराम समस्त हिन्दू जाति के आदर्श हैं। वे पूर्ण बालब्रह्मचारी थे। वे चिरंजीवी है । ऐसा माना जाता है। कि भगवान् परशुराम पृथ्वी के अंत तक जीवित रहेंगे। पुराणों के अनुसार, महेंद्र गिरी पर्वत पर भगवान् परशुराम जी तपस्या किया करते थे। और आज भी बताया जाता है। कि कल्पांत तक भगवान् श्री परशुराम महेंद्र गिरी पर्वत पर ही तपस्यारत रहेंगे। भगवान् परशुराम जी को त्रेता युग में भगवान् श्री राम के समय पर भी देखा गया था। और महाभारत में श्रीकृष्ण के समय पर भी।

पुराणों के अनुसार एक बार जब त्रेतायुग के आरम्भ में भगवान् गणेश ने परशुराम जी को शिव जी के दर्शन करने से रोक दिया था। तब रुष्ट होकर भगवान् परशुराम ने उन पर फरसे से बार कर दिया था। जिससे उनका एक दांत टूट गया था। तभी से भगवान् गणेश एक दन्त कहलाये। इन्होने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रियों से विहीन कर दिया था। भगवान् परशुराम को तीव्र गुस्से बाला भी कहा जाता है। लेकिन उन्होंने त्रेतायुग में दशरथ, जनक आदि। जैसे राजाओं को पूर्ण सम्मान भी दिया था। द्वापर युग में उन्होंने भगवान् श्रीक्रष्ण सुदर्शन चक्र भी दिलवाया था। और कौरवों की सभा में भगवान् श्रीकृष्ण का समर्थन भी किया था। उन्होंने हो गुरु द्रोण, कर्ण व् दादा भीष्म को शस्त्र विद्या प्रदान की थी। उन्होंने ही कर्ण को शक्तियों का दुरूपयोग करने और असत्य बाचन बाचन पर सारी बिद्या भूल जाने का श्राप भी दिया था। भगवान् परशुराम का इतिहास इसी तरह की विभिन्न वीरगाथाओं से भरा हुआ है।

भगवान् परशुराम का जन्म समय

भगवान् परशुराम ने त्रेता युग में भगवान् विष्णु के छठे अवतार में जन्म लिया था। इनका जन्म भगवान् श्री राम के जन्म से भी पूर्व हुआ था। भगवान् श्री राम विष्णु भगवान् के सातवें अवतार थे। विभिन्न इतिहासकारों के दृष्टिकोण के अनुसार भगवान् श्री राम का जन्म 5114 ईसा पूर्व हुआ था। तथा दूसरी ओर इतिहासकारों और विद्वानों के अनुसार भगवान् परशुराम का जन्म 5142 वि.पू. वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन-रात्रि के प्रथम प्रहर में हुआ था। इनके जन्म का समय सतयुग और त्रेतायुग का संधिकाल माना जाता है। भवन श्री परशुराम जी का जन्म 6 उच्च ग्रहों के योग में हुआ था। इसलिए भगवान् परशुराम महान प्रतापी, महा तेजस्वी, महा ओजस्वी और वलबान बने। भगवान् परशुराम का जन्म अक्षय तृतीया के दिन हुआ था। इसलिए अक्षय तृतीया के दिन भगवान् परशुराम जी की जयंती मनाई जाती है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में रात्रि के प्रथम प्रहर में माता रेणुका के गर्भ से भगवान परशुराम का अवतार हुआ था।

भगवान् परशुराम के जन्म की कथा

भृगु वंश में पैदा हुए भगवान् परशुराम के पिता जमदग्नि और माता का नाम रेणुका था। एक बार जब भृगु ने अपने पुत्र के विवाह के विषय में जाना, तो वे बहुत प्रसन्न हुए। तभी उन्होंने अपनी पुत्रवधू सत्यवती से वर माँगने को कहा। तभी सत्यवती ने भृगु जी से वरदान स्वरुप अपने और अपनी माता के लिए पुत्र के जन्म की कामना की। भृगु जी ने उन दोनों को 'चरु' भक्षणार्थ दिये। और कहा, कि ग्रीष्म ऋतुकाल के उपरान्त स्नान करके सत्यवती गूलर के पेड तथा उसकी माता पीपल के पेड़ का आलिंगन करे। तो दोनों को पुत्र प्राप्त होंगे।

ग्रीष्म काल ख़त्म हो जाने के पश्चात् माँ-बेटी से 'चरु' को खाने में उलट-फेर हो गयी। तभी दिव्य दृष्टि से देखकर भृगु जी वहाँ पुनः पधारे तथा उन्होंने सत्यवती से कहा, तुमने चरु के खाने में उलट-फेर कर दी। इसलिए तुम्हे और तुम्हारी माता को पुत्र रत्न की प्राप्ति तो होगी। लेकिन तुम्हारी माता का पुत्र क्षत्रिय होगा। और वह ब्राह्मणोचित व्यवहार करेगा। तथा तुम्हारा पुत्र ब्राह्मण होकर भी क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला होगा। सत्यवती के बहुत अनुनय-विनय करने पर भृगु जी ने कहा। कि सत्यवती का बेटा ब्राह्मणोचित रहेगा। किंतु पोता ब्राह्मण होकर भी क्षत्रियों की तरह कार्य करने वाला होगा।

माता सत्यवती के गर्भ से जमदग्नि मुनि ने जन्म लिया। जमदग्नि मुनि ने माता रेणुका के साथ विवाह किया था। माता रेणुका को पांच पुत्र रत्नो की प्राप्ति हुयी।

  • रुमण्वान
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सहस्त्रबाहु का वध

परशुराम सभी भाइयों में छोटे एक श्रेष्ठ ब्राह्मण होने के बाद भी क्षत्रियोचित अचार-विचार वाले थे। एक बार बात है, जब परशुराम तपस्या पर गए थे। और माता रेणुका और जमदग्नि ऋषि आश्रम में अकेले थे। तभी राजा सहस्त्रबाहु जंगल में शिकार खेलने गया। तभी जंगल में रास्ता भटक कर जमदग्नि मुनि के आश्रम में पहुंचा। वह बहुत ही घमंडी और स्वाभिमानी राजा था। जमदग्नि मुनि ने कामधेनु गाय की सहायता से उसका राजसी स्वागत किया।

कामधेनु को देखकर सहस्त्रबाहु मुग्ध हो गया। और कामधेनु को अपने साथ ले जाने के लिए सैनिको को इशारा किया। उस वक्त परशुराम आश्रम में नहीं थे। और वह कामधेनु का हरण करके उसे अपने साथ ले गया। माता रेणुका कामधेनु के वियोग में पागल सी हो गई थी। और काम से काम 21 बार उन्होंने अपने सर को जमीन पर पटका था।

इस घटना के बारे में जब परशुराम को पता चला। तो उन्होंने प्रतिज्ञा ली, कि मैं 21 बार पृथ्वी को क्षत्रियों से विहीन कर दूंगा। और अपना फरसा लेकर माहिष्मती की ओर चल दिए। क्यूंकि सहस्त्रबाहु माहिष्मती में निवास करता था। अभी सहस्त्रबाहु माहिष्मती के मार्ग में ही था, कि परशुराम उसके पास जा पहुंचे। सहस्त्रबाहु ने जैसे ही देखा की परशुराम प्रचंड गति से उसकी ओर चले आ रहे हैं, तो उसने परशुराम का सामना करने के लिए अपनी सेनाएँ खड़ी कर दीं। एक ओर हज़ारों सैनिक थे, दूसरी ओर अकेले लंगोटधारी ब्राह्मण परशुराम थे, घनघोर युद्ध होने लगा। परशुराम ने अकेले ही क्षण भर की देरी में सहस्त्रबाहु के समस्त सैनिकों को मृत्यु के मुख में पहुँचा दिया।

जब सहस्त्रबाहु की संपूर्ण सेना नष्ट हो गई, तो वह स्वंय रण के मैदान में परशुराम का सामना करने के लिए उतरा। सहस्त्रबाहु अपने हज़ार हाथों से हज़ार बाण एक ही साथ परशुराम जी पर छोड़ने लगा। परशुराम उसके सभी बाणों को अपने दोनों हाथों से ही नष्ट करने लगे। जब बाणों का कुछ भी प्रभाव परशुराम जी के ऊपर नहीं पड़ा, तो सहस्त्रबाहु ने एक बड़ा वृक्ष उखाड़कर उसे हाथ में लेकर परशुराम की ओर झपटा। परशुराम ने अपने बाणों से वृक्ष को खंड-खंड कर दिया, साथ ही सहस्त्रबाहु के मस्तक को भी काटकर पृथ्वी पर गिरा दिया। सहस्त्रबाहु रणभूमि में सदा के लिए सो गया।

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