बालकाण्ड - 1

भगवान् श्री राम का अवतार तथा उसकी आवश्यकता

भगवान् श्रीराम के जन्म के कारण

यह प्रसंग उस समय का है, जब भगवान शिव, जगतजननी माता पार्वती को परम सुख के धाम श्री कैलास पर्वत पर बैठकर रामचरितमानस की मंगलमयी कथा सुना रहे थे।

जब जब होइ धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।।
तब तब प्रभु धर बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।


शिव जी कहते हैं, हे उमा ! सुनो, जब जब धर्म का नाश होता है। और नीच अधम अभिमानी राक्षस बढ़ जाते हैं। तब-तब कृपानिधान प्रभु भांति-भांति के दिव्य शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं। वे असुरों को मारकर देवताओं को स्थापित करते हैं। अपने वेदों की मर्यादा की रक्षा करते हैं। और जगत में आपना निर्मल यश फैलते हैं। हे उमा प्रभु श्री राम जी के अवतार का यही कारण है। उसी यश को गाकर भक्तजन भवसागर से तर जाते हैं। कृपासागर भगवान् भक्तों के हित के लिए शरीर धारण करते हैं। श्री राम चंद्र जी के जन्म लेने के अनेक कारण हैं। जो एक से एक बढ़कर विचित्र हैं।

द्वारपाल प्रिय हरि के दोऊ । जय अरु विजय जान सब कोऊ ।।
बिप्र श्राप तें दूनउ भाई। तामस असुर देह तिन्ह पाई ।।


शिव जी कहते हैं, हे उमा ! श्री हरी के जय और विजय नाम के दो प्यारे द्वारपाल हैं। जिनको सब कोई जानता है। उन दोनों भाइयों ने ब्राह्मण सनकादि के श्राप से असुरों का तामसी शरीर पाया। एक का नाम हिरण्यकश्यपु और दूसरे का नाम हिरण्याक्ष था जिन्होंने देवराज इंद्र का भी अभिमान चूर-चूर कर दिया था। इनमे से हिरण्याक्ष को भगवान् ने वराह (सूअर) का शरीर धारण करके मारा। और हिरण्यकश्यपु को नरसिंह अवतार लेकर मारा था। और भक्त प्रह्लाद का सूंदर यश फैलाया।

वे दोनों ही आगे चलकर देवताओं को जीतने बाले बड़े योद्धा रावण और कुम्भकरण हुए। जिन्हे सारा जगत जानता है। भगवान् के द्वारा मारे जाने पर भी वे दोनों इसलिए मुक्त नहीं हुए थे। की ब्राह्मण सनकादि का श्राप तीन जन्मों के लिए था। अतः उन पुनः उद्धार के लिए भगवान् ने फिर अवतार लिया। वहां उस जन्म में कश्यप और अदिति उनके माता पिता हुए। जो दशरथ और कौसल्या के नाम से प्रसिद्द हुए।

नारद जी द्वारा श्री हरी को श्राप

हिमगिरि गुफा एक अति पावन। वह समीप सुरसरि सुहावन ।।
आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवऋषि मन अति भाव ।।


हिमालय पर्वत में एक बहुत ही अच्छी पवित्र गुफा थी। उसके समीप ही माता गंगा की निर्मल धारा बहती थी। वह पवित्र जगह नारद जी के मन को भा गयी। उस सुन्दर जगह को देखकर नारद मुनि के चरण वहीं ठहर गए। प्रभु के चरणों में ध्यान लगाकर उसी स्थान पर समाधि लगा ली। जबकि उस समय नारद जी को दक्ष प्रजापति का ( एक जगह न रुक पाने का ) श्राप लगा हुआ था। नारद मुनि की यह तपोमयी स्थिति देखकर देवराज इंद्रा डर गया। उसने कामदेव को बुलाकर उसका आदर सत्कार किया। और नारद मुनि की तपस्या को भांग करने के लिए भेजा। मीनध्वज कामदेव मन में प्रसन्न होकर चला। इंद्र को डर था कि नारद जी मेरी पुरी अमरावती पर राज्य करना चाहते है। जगत में जो लोभी और कामी लोग होते है, वे कुटिल कौवे की तरह सबसे डरते हैं।

जब कामदेव उस आश्रम में गया। तब उसने अपनी माया से वसंत-ऋतू को उत्पन्न किया। तरह-तरह के वृक्षों पर रंग विरंगे फूल खिल गए, उन पर कोयलें कूकने लगीं। और भौरें गुंजार करने लगे। कामाग्नि को भड़काने बाली तीनो प्रकार की ( शीतल, मंद, सुगंध ) सुहावनी हवा चलने लगी। रम्भा आदि नवयुवती देवांगनाएँ, जो सब की सब कामकला में निपुण थी। वे सुन्दर आवाज में गायन करने लगी। हाथ में गेंद लेकर विभिन्न प्रकार के खेल खेलने लगीं। कामदेव अपने इन सहायकों को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने अनेकों प्रकार के मायाजाल बिछाये। लेकिन नारद मुनि पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तब उसने हार मानकर नारद मुनि के चरणों को जा पकड़ा। नारद जी के मन में विकुल भी क्रोध नहीं हुआ। और प्रिय बचन कहकर कामदेव का समाधान किया। तब मुनि के चरणों में सिर नवाकर अपने सहायकों सहित कामदेव बहां से लौट गया।

बहां से नारद मुनि शिव जी पास गए। उनके मन में इस बात का अहंकार था, कि उन्होंने कामदेव को जीता है। उन्होंने कामदेव का सारा प्रसंग शिव जी को सुनाया। शिवजी ने नारद जी को अत्यंत प्रिय समझकर शिक्षा दी, कि वे इस प्रसंग के बारे में श्रीहरि को न बताएं। भगवान् शिव ने उनके हित की बात कही थी। पर नारद जी अच्छी नहीं लगी। तब वे बहां से सीधे ब्रह्मलोक को चल दिए। पर ब्रह्मा जी ने भी इसे श्रीहरि को बताने से मना किया। लेकिन फिर भी बे श्रीहरि का गुणगान करते हुए भगवान् विष्णु के पास पहुंचे। और कामदेव का सारा चरित्र भगवान को कह सुनाया। तब भगवान् श्रीहरि ने कहा - हे मुनिराज ! मोह तो उनके मन में होता है जिनके हृदय में ज्ञान-वैराग्य नहीं है। आप तो ब्रह्मचर्य व्रत में तत्पर और बड़े धीरबुद्धि है। भला आपको भी कामदेव सता सकता है। नारद जी ने अभिमान के साथ कहा - भगवन यह सब आप ही की कृपा है। भगवान् हरि ने मन में झांककर देखा कि इनके मन में गर्व के भारी वृक्ष का अंकुर पैदा हो गया है। मै उसे तुरंत उखाड़ फेंकूँगा। नारद जी भगवान् के चरणों में सर नवकार बहां से चले। उनके हृदय में अभिमान और भी बढ़ गया। तभी लक्ष्मीपति भगवान् ने माया को प्रेरित किया।

उस माया ने रास्ते में सौ योजन का एक बहुत ही सुन्दर नगर बनाया। उस नगर में शीलनिधि नाम का राजा रहता था। उसकी विश्वमोहिनी नाम की एक कन्या थी। जो बहुत ही सूंदर थी। वह राजकुमारी स्वंवर करना चाहती थी। इससे बहां अगणित राजा आये हुए थे। नारद मुनि उस नगर में आये और नगरवासियों से उन्होंने सब हाल पूंछा। सब समाचार सुनकर वे राजा के महल में आये राजा ने पूजा करके मुनि को आसन पर बैठाया। और राजकुमारी को दिखाकर उसके गुण दोष दिखाने लगे। उसके रूप को देखकर मुनि वैराग्य भूल गए। और उसी के रूप को देखने लगे। उसके रूप को देखकर मुनि खुद को भी भूल गए। उसके हस्तरेखा को देखकर मुनि अचंभित हो गए कि जो भी इसे ब्याहेगा वह अमर हो जाएगा। और रणभूमि में उसे कोई जीत न सकेगा। उनके मन में उस कन्या से विवाह करने की उमंग सी हो गयी। इसके लिए उन्हें बहुत ही सुन्दर रूप चाहिए था। इसके लिए वे भगवान् विष्णु के पास गए और उनसे हरी रूप माँगा। भगवान् विष्णु ने उन्हें इतना कुरूप बना दिया जिसका वर्णन नहीं हो सकता। नारद जी स्वंवर में पहुंच गए। बहां शिव जी के दो गण भी थे जो सारा भेद जानते थे। वे व्राह्मण का रूप धारण कर सारी लीला देखते फिरते हैं। विश्वमोहिनी माला लेकर आती है और पूरी सभा में माला लेकर सभी के पास जाती है। नारद जी बार-बार सिर आगे कर देते है। उन्हें ये भ्रम था कि मुझसे ज्यादा सुन्दर यहाँ कोई नहीं है। भगवान श्रीहरि राजा का रूप धारण करके बहां वैठे हुए थे।

विश्वमोहिनी ने भगवान् विष्णु के गले में माला डाल दी। मोह के कारण नारद जी को बहुत दुःख हुआ। तभी शिवजी के गणों ने मुस्कराकर कहा जाकर दर्पण में अपना मुँह तो देखिये। ऐसा कहकर वे दोनों भयभीत होकर भागे। मुनि ने जल में झांककर अपना मुँह देखा तो उन्हें बहुत गुस्सा आया। उन्होंने शिवजी के दोनों गणों को अत्यंत कठोर श्राप दिया। तुम दोनों कपटी जाकर राक्षस हो जाओ। मुनि ने दोबारा जल में झाँका तो उन्हें अपना असली रूप प्राप्त हुआ। लेकिन उनके मन में क्रोध भरा हुआ था। तुरंत ही वे भगवान् कमलापति के पास को चले। और मन में सोचते जा रहे है, कि आज या तो श्राप दूंगा या फिर अपने प्राण त्याग दूंगा। उन्होंने जगत में मेरी हंसी करायी है। दैत्यों के शत्रु भगवान् विष्णु उन्हें रास्ते में ही मिल गए। साथ में लक्ष्मी जी और वही राजकुमारी थी। भगवान् विष्णु ने वड़े ही विनम्र भाव से कहा - हे मुनि व्याकुल होकर कहाँ चले। ये शब्द सुनते ही उनके अंदर क्रोध की ज्वाला फूट पड़ी। उन्होंने श्री हरी को अपशब्द कहते हुए श्राप दे दिया। कि जिस तरह आज मै स्त्री के वियोग में दुखी हूँ। उसी तरह तुम भी एक दिन स्त्री के वियोग में दुखी होंगे। तुमने हमारा रूप बंदर का बना दिया। इससे बंदर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। मै जिस स्त्री को चाहता था तुमने उससे मेरा वियोग कराकर मेरा अहित किया है। श्राप को सिर चढ़ाकर हृदय में हर्षित होते हुए भगवान् ने अपनी माया की प्रबलता खींच ली। माया के हटते ही वहां न लक्ष्मीजी ही रह गयी और न ही राजकुमारी ही। तब अत्यंत भयभीत होकर मुनि ने श्रीहरि के चरण पकड़ लिए और कहा - हे शरणागत के दुखों को हरने बाले मेरी रक्षा कीजिये। हे कृपालु ! मेरा शाप मिथ्या हो जाए। तब भगवान् ने कहा कि यह सब मेरी ही इच्छा से ही हुआ है।

तब मुनि ने कहा मैने आपको अनेकों खोते बचन कहे है। मेरे पाप कैसे मिटेंगे ? भगवान् ने कहा - तुम जाकर शंकर जी के शतनाम का जाप करो इससे हृदय में तुरंत शान्ति मिलेगी। अब मेरी माया तुम्हारे निकट भी नहीं आएगी। भगवान् शिव पार्वती से कहते हैं - हे जगतजननी भगवान् राम का अवतार होने के बैसे तो बहुत से कारण है। किन्तु यह कारण भी उनमे से एक है।



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