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ताजमहल के मुख्य पांच रहस्य, जानकर चौंक जाओगे

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ताजमहल के अंदर आज भी काफी ऐसे राज छिपे हुए है। जिनके बारे में अभी कोई स्पष्टता हासिल नहीं हो सकी है, ताजमहल शाहजहां का बनवाया हुआ एक मकबरा है, या राजपूत राजाओं की ओर से मुग़ल बादशाह को तोहफ़े में दिया गया प्राचीन शिव मंदिर है ? इसके बारे में बहुत सी बातें अक्सर चर्चा में रहती है। आओ जानते हैं ताजमहल के अनोखे 5 रहस्यों के बारे में ।

ताजमहल एक अजूबा - सात आश्चर्यों में से एक

ताजमहल अपनी अलौकिक सुंदरता से भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में अपनी पहचान बना चुका है। ताजमहल उत्तरप्रदेश के आगरा जिले में यमुना नदी के किनारे स्थित है, यह सफ़ेद संगमरमर के पत्थरों से बना हुआ है। ताजमहल को दुनिया के सात अजूबों में शामिल किया गया है।

शाहजहां और मुमताज के मकबरा के बारे में

भारतीय इतिहास में ताजमहल को शाहजहां और मुमताज के प्यार का प्रतीक बताया गया है, भारतीय इतिहास में लिखा है कि ताजमहल शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज की याद में बनबाया था, शाहजहां अपनी पत्नी मुमताज से बहुत प्यार करता था। इसी बजह से ताजमहल को दुनियाभर में प्रेम का प्रतीक मन जाता रहा है। लेकिन कुछ इतिहासकार इसे प्यार का प्रतीक नहीं मानते। प्रसिद्द इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक ने अपनी एक पुस्तक में लिखा हैं, कि शाहजहां ने ताजमहल में अपनी लूट की दौलत छुपा रखी थी। इसलिए उसे कब्र के रूप में प्रचारित किया गया।

क्या शाहजहां और मुमताज का प्रेम झूठा था

प्रसिद्द इतिहासकार और शोधकर्ता नागेश ओक ने ताज महल के कई रहस्यों से पर्दा उठाया है। पुरुषोत्तम नागेश ओक के अनुसार शाहजहाँ ने मुमताज के लिए दफन स्थान बनवाया था, ताजमहल की खूबसूरती को देखते हुए इतिहासकार यह मानने लगे कि निश्चित ही शाहजहां और मुमताज का प्यार बहुत ही सच्चा रहा होगा। जिसके लिए शाहजहां ने इतने सुन्दर मकबरा का निर्माण करबाया। तब तथाकथित इतिहासकारों और साहित्यकारों ने ताजमहल को प्रेम का प्रतीक लिखना शुरू कर दिया।

इतिहासकारों ने शाहजहां और मुमताज के प्यार को लैला-मजनू , रोमियो और जूलियट की तरह लिख दिया, जिसके चलते कई फिल्मे भी बना दी गयी। लेकिन यह एक झूठ था जो आज भी जारी है। मुमताज से विवाह होने से पहले भी शाहजहां के अन्य कई विवाह हुए थे। इसिलए मुमताज की मृत्यु पर इतना खर्चीला मकबरा ताजमहल बनवाने का कोई कारण नजर नहीं आता।

मुमताज किसी राजा या किसी बादशाह की बेटी भी नहीं थी। और उसका कोई खास योगदान भी नहीं रहा। मुमताज का नाम चर्चा में इसलिए आया कि मुमताज ने एक युद्ध के दौरान एक बेटी को जन्म दिया था, जिसकी वजह से मुमताज की मृत्यु हो गयी थी। इसलिए मुमताज को किसी विशेष प्रकार के भव्य महल में दफनाने का कोई कारण ही नजर नहीं आता।

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तेजोमहालय के बारे में

इतिहासकार पुरुषोत्त ओक ने लिखा है कि ताजमहल के एक मंदिर होने के 700 से अधिक सबूत मौजूद हैं। जो यह सिद्ध करते है, कि ताजमहल एक पुराना शिव मंदिर था। पुरषोत्तम नागेश ओक ने अपनी किताब में बताया कि ताजमहल को पहले 'तेजो महालय' कहते थे। इस बात को उन्होंने पूर्ण शोध करने के बाद ही अपनी पुस्तक में लिखा था।

वर्तमन में ताजमहल पर ऐसे 700 चिन्ह खोजे गए हैं जो इस बात को दर्शाते हैं, कि इसका पुनर्निर्माण किया गया है। वास्तुकला के प्रसिद्द विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र नामक प्रसिद्ध ग्रंथ में शिवलिंगों में 'तेज-लिंग' का वर्णन आता है। ताजमहल में 'तेज-लिंग' प्रतिष्ठित था, इसीलिए उसका नाम 'तेजोमहालय' पड़ा था।

पहले तेजोमहालय उर्फ ताजमहल को नागनाथेश्वर के नाम से जाना जाता था, क्योंकि तेजोमहालय जलहरी को नाग के द्वारा लपेटे जैसा बनाया गया था। यह मंदिर एक विशालकाय महल क्षेत्र में था। ताजमहल को पहले 'तेजोमहालय' कहा जाता था।

प्रसिद्द शोधकर्ता पुरुषोत्तम ओक ने अपनी पुस्तक में बताया, बादशाहनामा नाम की एक पुस्तक है जिसमे दरबार का लेखा जोखा लिखा जाता था। उस पुस्तक में पृष्ठ संख्या 403 भाग 1 स्वीकारोक्ति है। कि मुमताज को दफनाने के लिए शाहजहां ने जयपुर के महाराजा जयसिंह से एक चमकदार, बड़े गुम्बद वाला विशाल भवन लिया गया। यह भवन राजा मानसिंह के भवन के नाम से जाना जाता था।

जयपुर के पूर्व महाराजा ने अपनी दैनंदिनी में 18 दिसंबर, 1633 को जारी किए गए शाहजहां के ताज भवन समूह को मांगने के बाद दो फरमानों (नए क्रमांक आर. 176 और 177) के विषय में लिख रखा है। यह बात जयपुर के उस समय के शासक के लिए घोर लज्जाजनक और अपमानपूर्ण थी।

बाद में दफनाया गया था मुमताज बेगम को

मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी शाहजहां के दरबारी लेखक थे उन्होंने अपने बादशाहनामा में मुगल शासक शाहजहां का संपूर्ण वृत्तांत 1000 से अधिक पृष्ठों में लिखा है। जिसके एक खंड के पृष्ठ 402 और 403 में मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी ने उल्लेख किया है, कि शाहजहां की बेगम मुमताज-उल-मानी जिसे मृत्यु के बाद बुरहानपुर मध्यप्रदेश में अस्थाई तौर पर दफना दिया गया था।

और छह महीने बाद 15 तारीख मदी-उल-अउवल दिन शुक्रवार को अकबराबाद आगरा लाया गया, फिर उसे महाराजा जयसिंह से लिए गए आगरा में स्थित एक असाधारण रूप से सुंदर और शानदार भवन इमारते आलीशान में पुनः दफनाया गया।

मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी के अनुसार राजा जयसिंह को अपने पुरखों की इस बेहद आलीशान मंजिल से बहुत प्यार था, पर बादशाह के दबाव में राजा जयसिंह ने इसे शाहजहां को दे दिया। इस बात की पुष्टि के लिए आपको यह बताना अत्यंत आवश्यक है, कि जयपुर के महाराज राजा जयसिंह के गुप्त संग्रह में वे दोनों आदेश अभी तक लिखे हुए हैं, जो शाहजहां द्वारा ताज भवन समर्पित करने के लिए राजा जयसिंह को दिए गए थे।

उपसंहार

यह पूरा वृतांत जो आपने इस पोस्ट में पढ़ा। इसे महान इतिहासकार व् शोधकर्ता पुरुषोत्तम नागेश ओक की एक पु्स्तक 'ताजमहल तेजोमहालय शिव मंदिर है' के अंश से लिया गया है। अगर आपको यह पोस्ट और जानकारी अच्छी लगी हो तो इस पोस्ट को दोस्तों में अवश्य शेयर करें।



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