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गुरु गोरखनाथ की कहानी - Guru Gorakhnath Ki Kahani

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गोरखनाथ जी की जीवन कहानी

गुरु गोरखनाथ के गुरु का नाम गुरु मछंदर नाथ जी था।एक बार गुरु मछंदर नाथ जी अपनी तपस्या में लीन भगवान शिव शंकर की तपस्या कर रहे थे। तभी अचानक आकाशवाणी हुई। हे महायोगी तपस्वी अटल सत्य की सील सचमुच भगवान स्वरूप ।

हे। सन्यासी मानव बाबा मछंदर नाथ पृथ्वी के पाप हरण दुखियों के कष्ट निवारण  के लिए आप ने अवतार लिया है। पृथ्वी पर संकट  हरना।अथवा धुना रामाना  भक्ति और भंडारण को छोड़कर धर्म के लिए कर्म कल्याण सृष्टि के कल्याण में अपने फर्ज तथा कर्तव्य का पालन करो। नाथ पंथ के उजाले से संसार के अंधेरों को दूर करो। तो साधु और धर्म का कल्याण अलख निरंजन के ज्ञान से ही होगा। रमता जोगी और बहता पानी ही सदा अच्छे लगते हैं।पानी यदि ठहर गया तो महला हो जाएगा ।और यदि साधु ठहर गया तो धर्म पंथ महला हो जाएगा। समाधि तोड़ो और आंखें खोलो। संत पंथ के उद्धार के लिए आपको घर-घर अलग जगाना है। ताभी बाबा मछंदर नाथ नाथों का योग और तब सफल होगा।

गुरु गोरखनाथ जी का जन्म का वरदान देना

जब गुरु मछंदर नाथ जी जालंधर नगर में शकुंतला के घर अलख जगा रहे थे। (भिक्षा मांगना) तभी शकुंतला देवी मछंदर नाथ जी को भिक्षा देने अपने घर से बाहर आई।शकुंतला देवी के चेहरे पर उदासी देखकर मछंदर नाथ जी भीक्षा नहीं लेते हैं। और पूछते हैं। हे माई आपके चेहरे पर यह उदासी कैसी है। शकुंतला देवी कहती हैं। हे योगी मुझे कई साल बीत गए हैं। कोई भी संतान नहीं है। तो गुरु मछंदर नाथ जी ने जों के दाने की गोली बनाकर दे देते हैं। और कहते हैं। हे माई इस भभूत को कल सुबह प्रात:उठकर सूर्यनारायण को नमन कर भाभूत को खा लेना। आत: हम अब प्रस्थान करते हैं। तो शकुंतला देवी कहती है। हे।महाराज आप मेरे घर में ही अपनी धूनी जमा ले.अथवा इस तरह जाना हमको अच्छा नहीं लग रहा है।  गुरु मछंदर नाथ जी कहते हैं। हे माई हम साधुओं को यह शोभा नहीं देता।अतः आप इतना कह रही है तो हम शीघ्र ही 12 वर्ष के बाद इस बच्चे को आशीर्वाद देने आएंगे। और यह बहुत ही चमत्कारी बालक होगा।

शकुंतला  को पति द्वारा भड़काना

जब शकुंतला के पति देवी दास को पता चला। कि मेरी पत्नी शकुंतला को किसी योगी ने कुछ खाने को दिया है। तो वह शकुंतला के पास जाता है। और कहता है। हे रानी यह सब आपको शोभा नहीं देता। कि आप किसी भी साधु द्वारा दी गई दवाई से पुत्र प्राप्त करें। अच्छा यही रहेगा कि आप साधु द्वारा दी गई दवाई को फेंक दे। आत: शकुंतला ने अपने पति के बातों में आकर  गुरु मछंदर नाथ द्वारा दी गई दवाई को अपने कूड़े के ढेर में फेंक दिया।

गुरु गोरखनाथ जी का जन्म 

गुरु गोरखनाथ का जन्म गोबर के खाद से हुआ था। तथा वह गोबर के खाद में ही 12 साल तक पले बढ़े थे।

गुरु मछंदर नाथ जी अपने शिष्यों के साथ भगवान शंकर की आराधना करने जा रहे थे। तभी उन्होंने भगवान शंकर की तपस्या के लिए अपना चिमटा धरती में गाड़ा। तभी जमीन से रक्त की धार बह निकली। और हे। गुरुदेव नाम की आवाज का आवाहन हुआ तभी गुरु मछंदर नाथ जी शकुंतला के घर जाकर पूछते हैं। हे माई। हमने जो पुत्र वरदान दिया था। हमको उससे मिला दो। अतः हम उसे लेने आए हैं। वो कहां है। तो शकुंतला कहती है। हे महाराज मुझको क्षमा कर देना। आपके जाने के पश्चात मैंने वह दवाई कूड़े में फेंक दी थी। और इतना सुनते ही गुरु मछंदर नाथ जी शकुंतला देवी पर क्रोधित हो जाते हैं। और नगर के बाहर कूड़े का ढेर खुदवा कर देखते हैं। तो गुरु गोरखनाथ गोबर के कूड़े में अंदर जमीन में सो रहे थे। तभी उस 12 वर्ष के बच्चे को देखकर शकुंतला की आंखें फटी की फटी रह गई और वह गुरु मछंदर नाथ जी से वापस मांगने लगी। इतनी बात सुनते ही।  मछंदर नाथ जी क्रोधित होकर शकुंतला जी को बहुत डांटते हैं। और कहते हैं। कि आज से किसी भी साधु का विश्वास भंग मत करन।जा मैं तुझको श्राप देता हूं।तू सातों जन्म तक निसंतान ही रहेगी। श्राप देते ही गुरु मछंदर नाथ जी अपने शिष्यों के साथ अंतर्ध्यान हो जाते हैं।

गुरु गोरखनाथ का  गुरु मछंदर नाथ से बिछड़ना

जब त्रीयाजाल के राजा भूप सिंह का निधन हो गया था। तब भूप सिंह की पत्नी ने गुरु मछंदर नाथ जी से तपस्या कर तीन वचन ले लिए थे।

(1)सब्मोहित

(2) अशनतन्हिन प्रजा

(3) त्रयोदशी सुहागन

सब्मोहित

हे। गुरुदेव जब अगर मैं किसी भी मनुष्य की तरफ देखूं। तो उस पर मेरे रूप का जादू चल जाए। और वह मेरे ऊपर अपना सब कुछ भूल कर मेरे साथ ही रहे। यह मेरा पहला वचन है।

अशनतन्हीन प्राजा

हे। गुरु देव दूसरा वचन इस प्रकार है। कि  मेरे राज्य हमेशा मेरा ही रहे। और मेरे राज्य की प्रजा में कोई भी स्त्री गर्भधारण ना रहे।और इस वचन को पूरा करने के लिए आप हनुमान को मेरे महल के आसपास पहरेदारी के लिए छोड़ देंगे। अतः हनुमान बाबा को गुरु मछंदर  नाथ जी ने पहरेदारी पर रख दिया। और हनुमान बाबा रात के 12:00 बजे त्रियाजाल के राज्य में आते थे।और राज्य में अपनी आवाज की गर्जना करते थे। जिसकी आवाज सुनकर जो भी स्त्री  गर्भधारण करती थी।उसका गर्भपात अचानक रुक जाता था।

त्रयोदशी सुहागन

हे।गुरुदेव अगर मेरे पति की मृत्यु हो जाए।तो वे पुनः 3 दिन के बाद जीवित हो जाएं। अतः मैं 3 दिन के बाद फिर से सुहागन हो जाऊं।यह मेरा त्रयोदशी सुहागन वचन है।

गुरु गोरखनाथ का गुरु मछंदर नाथ जी से बिछड़ना

जब त्रीयाजाल की महारानी के पति की मृत्यु हो गई। तो गुरु मछंदर नाथ जी के त्रयोदशी  सुहागन  वचन के कारण गुरु मछंदर नाथ जी ने अपना शरीर त्याग कर राजा भूपसिंह के शरीर में जाकर समा गए थे। जिससे राजा पुनः जीवित हो उठे।और अपने शिष्य गोरखनाथ को अपना मृत शरीर सौंप दिया।और कहा शिष्य में समय 12 वर्ष के बाद फिर आऊंगा। तब तक मेरे शरीर को अपने पास संभाल कर रखना। और इतना कहकर गुरु गोरखनाथ को अकेला छोड़कर मछंदर नाथ जी त् त्रियाजाल की महारानी के पास चले गए।

गुरु गोरखनाथ द्वारा मछंदर नाथ जी का शरीर गुम जाना

जब गुरु गोरखनाथ जी अकेले रह गए थे। तब अपने गुरु का मृत शरीर एक गुफा में रख दिया। जो कि इस एक ग्वालन ने देख लिया था। जब गोरखनाथ मृत शरीर को रख कर वहां से चले गए। तो उस ग्वालन स्त्री ने उस मृत शरीर को निकाल कर अपनी महारानी को ले जा कर दे दिया। इस बात पर महारानी क्रोधित हुई। और बोली मेरे राज्य में एक मृत शरीर वह भी एक साधु का।सिपाहियों इस शरीर को उठाकर इसको काट काट कर जंगल में फेंक दो। जिससे इस शरीर का एक भी कतरा हमारे राज्य में ना रहे। और सिपाहियों ने ऐसा ही किया। और गुरु मछंदर नाथ के शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर जंगल में फेंक दिया। 12 वर्ष के बाद जब गुरु गोरखनाथ को अपने गुरु मछंदर नाथ की याद आई।तो वह पुनः उस गुफा की तरफ चल देते हैं। जहां पर उन्होंने अपने गुरु का मृत शरीर रखा था। गुफा में पहुंचते ही क्या देखते हैं।कि वहां पर गुरु का मृत शरीर नहीं था। और यह सब देखते ही।गुरु गोरखनाथ बहुत चिंता में डूब जाते हैं क्योंकि 12 वर्ष पूर्ण होने वाले थे। और गुरु मछंदर नाथ की याद बहुत सता रही थी। अतः शरीर का ना मिलना उनके लिए बहुत चिंता की विषय बन चुका था। और गुरु जी का लौट कर आना भी समय नजदीक आ गया था।

गुरु गोरखनाथ जी के गुरु का शरीर कैसे मिला

बात उस समय की है। जब गुफा में गुरु मछंदर नाथ का मृत शरीर नहीं मिला। जब गोरखनाथ जीने अपनी तीसरी आंख खोली। और देखा कि किसी ग्वालन स्त्री ने शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर जल में फेंक दिया है। तब गोरखनाथ जी ने अपने सभी शिष्यों के साथ गुरु मछंदर नाथ के शरीर के टुकड़े-टुकड़े इकट्ठा करना शुरू कर दिया। काफी दिनों के बाद जब पूरा शरीर मिल गया तो। तब गुरु गोरखनाथ जी ने अपने गुरु मछंदर नाथ जी को याद किया। तब वह अपने गुरु से पुनः 12 वर्ष के बाद मिल पाए।

गुरु गोरखनाथ जी का गोरख टीला धाम कैसे बना

जब गुरु मछंदर नाथ जी अपने शिष्य गुरु गोरखनाथ को पूरी सृष्टि का आवाहन कराते हुए वापस त्रियाजाल के लिए जा रहे थे।तब गुरु गोरखनाथ जी ने कहा। हे। महाराज आपका यह शरीर रखने के लिए हमारे पास कोई जगह नहीं है।अतः इसको कोई भी हाथ लगाए यह हमारे लिए बड़ी दुख की बात है। कृपया आप हमारे लिए कोई कुटी का प्रबंध कीजिए। तब गुरु मछंदर नाथ जी ने राजस्थान के सरासर  जिले के निकट गोरखटीला नाम का एक स्थान गुरु गोरखनाथ जी को दिया। और कहा अब तुम्हारी यही पर पूजा होगी।पूरा संसार आपकी पूजा करेगा। और आप पूरी संसार का देखभाल करोगे। आपके यहां जो भी आएगा उसकी जो झोली खाली नहीं जाएगी।अतः आप इस संसार के कर्ताधर्ता तथा दुखियों के दुख हर्ता बनोगे। मेरा आशीर्वाद आपके साथ है। मैं पुनः 12 वर्ष के बाद आऊंगा। इतना कहकर गुरु मचंद्र नाथ जी वहां से चल दिए।

गोरखटीला पर मेला कब लगता है

गोरखटीला पर मेला लगते भादो 8 को लगता है। हर 12 वर्ष के बाद गुरु मछंदर नाथ जी वह आते हैं। और गुरु गोरखनाथ जी को आशीर्वाद देते हैं। 

जय गोरखनाथ बाबा



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