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स्वामी विवेकानंद हिंदी में -Swami Vivekananda In Hindi

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एक युवा संन्यासी के रूप में, स्वामी विवेकानंद, जिन्होंने विदेशों में भारतीय संस्कृति की सुगंध फैलाई, साहित्य दर्शन और इतिहास के एक महान विद्वान थे स्वामी विवेकानंद। स्वामी विवेकानंद ने, योग ’, 'राजयोग’ और ज्ञान योग ’जैसे ग्रंथों की रचना करके युवा जगत को एक नई राह दिखाई है, जिसका प्रभाव युगों तक जन-जन पर हावी रहेगा। कन्याकुमारी में बना उनका स्मारक आज भी स्वामी विवेकानंद की महानता की कहानी दर्शाता है।

“संभव की सीमा जानने का केवल एक ही तरीका है असंभव से भी आगे निकल जाना।“

स्वामी विवेकानंद एक बहुत अच्छी सोच वाले व्यक्ति थे। जिन्होंने आध्यात्मिक, धार्मिक ज्ञान के आधार पर, अपनी रचनाओं के माध्यम से मानव जीवन को सीखा। वह एक महान व्यक्ति थे जो हमेशा कर्म में विश्वास करते थे। स्वामी विवेकानंद का मानना था कि व्यक्ति को अपने लक्ष्य को पाने के लिए तब तक प्रयास करते रहना चाहिए जब तक कि लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।

महान प्रतिभाशाली स्वामी विवेकानंद के विचार बहुत प्रभावशाली थे, जिन्हें अगर कोई अपने जीवन में लागू करता है, तो सफलता निश्चित रूप से प्राप्त होती है - यही नहीं, विवेकानंद ने अपने आध्यात्मिक विचारों से भी लोगों को प्रेरित किया, जिनमें से एक यह विचार था। इस प्रकार है -

उठो जागो, और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो’ 

स्वामी विवेकानंद ने अपने आध्यात्मिक विचारों और दर्शन से न केवल लोगों को प्रेरित किया है बल्कि पूरी दुनिया में भारत को गौरवान्वित किया है।

स्वामी विवेकानंद की जीवनी - Swami Vivekananda Biography in Hindi

स्वामी विवेकानंद जी का पूरा नाम नरेंद्रनाथ विश्वनाथ दत्त था उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को पश्चिम बंगाल के कोलकाता में हुआ था। स्वामी विवेकानंद के पिता का नाम विश्वनाथ दत्त और माता भुवनेश्वरी देवी थी। स्वामी विवेकानंद जी के घर का नाम नरेन्द्र और नरेन था। ये कुल 9 भाई -बहन थे। इनके गुरु का नाम रामकृष्ण परमहंस  था। स्वामी विवेकानंद ने सन 1884 मे बी. ए. परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। साथ ही ये आजीवन वाल ब्रह्मचारी रहे। इन्होने शादी नहीं की थी। 

इन्होने भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी भारत की सभ्य संस्कृति का परचम लहराया था। इन्होने अमेरिका के न्यूयार्क में वेदांत सिटी की स्थापना की थी। इसके आलावा भी कैलिफोर्निया में शांति आश्रम और भारत में अल्मोड़ा के पास ”अद्धैत आश्रम” की स्थापना की। हिन्दू संस्कृति  और अध्यात्म का पाठ पूरी दुनियां को पढ़ाने बाले ऐसे महान दार्शनिक 4 जुलाई, 1902 पश्चिम बंगाल के बेलूर में इस नस्वर शरीर को त्याग कर पंचतत्व में बिलीन हो गए। 

स्वामी विवेकानंद जी के बारे में – Swami Vivekananda Information in Hindi

स्वामी विवेकानंद एक महान व्यक्ति थे जिनके उच्च विचार, आध्यात्मिक ज्ञान, सांस्कृतिक अनुभव ने सभी को प्रभावित किया। जिसने सभी पर एक अनोखी छाप छोड़ी। स्वामी विवेकानंद का जीवन सभी के जीवन में नई ऊर्जा भरता है और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। 

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स्वामी विवेकानंद एक प्रतिभाशाली व्यक्ति थे जिन्हें वेदों का पूरा ज्ञान था। विवेकानंद दूरदर्शी दृष्टि के व्यक्ति थे, जिन्होंने न केवल भारत के विकास के लिए काम किया बल्कि लोगों को जीने की कला भी सिखाई। भारत में हिंदू धर्म को बढ़ावा देने और भारत को औपनिवेशिक बनाने में उनके मुख्य समर्थन में स्वामी विवेकानंद की मुख्य भूमिका थी। 

स्वामी विवेकानंद एक दयालु व्यक्ति थे जिन्होंने न केवल मनुष्यों बल्कि जानवरों को भी इस भावना से देखा। उन्होंने हमेशा भाईचारे, प्रेम की शिक्षा दी और उनका मानना था कि जीवन को प्यार, भाईचारे और सद्भाव से आसानी से काटा जा सकता है और जीवन के हर संघर्ष को आसानी से निपटाया जा सकता है। वे स्वाभिमानी व्यक्ति थे और उनका मानना था कि -

जब तक आप स्वयं पर विश्वास नहीं करते, आप भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते ।।

स्वामी विवेकानंद के अनमोल विचारों ने उन्हें एक महान व्यक्ति बना दिया, उनका आध्यात्मिक ज्ञान, धर्म, ऊर्जा, समाज, संस्कृति, देशभक्ति, परोपकार, सदाचार, आत्म-सम्मान बहुत मजबूत थे, जबकि इस तरह के उदाहरण को शायद ही कभी ऐसे गुणों से समृद्ध व्यक्ति के रूप में देखा जाता है। भारत की भूमि में जन्म लेना भारत को पवित्र और गौरवपूर्ण बनाना है।

स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जो भारत में अभी भी सफलतापूर्वक चल रहा है। उन्हें मुख्य रूप से "मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों" के साथ अपना भाषण शुरू करने के लिए जाना जाता है। वे इसी शब्द के साथ अपने भाषण को शुरू करते थे। 

स्वामी विवेकानंद के अनमोल वचन - Precious words of Swami Vivekananda

  • उठो जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता।
  • हर आत्मा ईश्वर से जुड़ी है, करना ये है कि हम इसकी दिव्यता को पहचाने अपने आप को अंदर या बाहर से सुधारकर। कर्म, पूजा, अंतर मन या जीवन दर्शन इनमें से किसी एक या सब से ऐसा किया जा सकता है और फिर अपने आपको खोल दें। यही सभी धर्मो का सारांश है। मंदिर, परंपराएं , किताबें या पढ़ाई ये सब इससे कम महत्वपूर्ण है।
  • एक विचार लें और इसे ही अपनी जिंदगी का एकमात्र विचार बना लें। इसी विचार के बारे में सोचे, सपना देखे और इसी विचार पर जिएं। आपके मस्तिष्क , दिमाग और रगों में यही एक विचार भर जाए। यही सफलता का रास्ता है। इसी तरह से बड़े बड़े आध्यात्मिक धर्म पुरुष बनते हैं।
  • एक समय में एक काम करो और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमे डाल दो और बाकि सब कुछ भूल जाओ।
  • पहले हर अच्छी बात का मजाक बनता है फिर विरोध होता है और फिर उसे स्वीकार लिया जाता है।
  • एक अच्छे चरित्र का निर्माण हजारो बार ठोकर खाने के बाद ही होता है।
  • खुद को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है।
  • सत्य को हजार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी वह एक सत्य ही होगा।
  • बाहरी स्वभाव केवल अंदरूनी स्वभाव का बड़ा रूप है।
  • विश्व एक विशाल व्यायामशाला है जहाँ हम खुद को मजबूत बनाने के लिए आते हैं।
  • शक्ति जीवन है, निर्बलता मृत्यु है। विस्तार जीवन है, संकुचन मृत्यु है। प्रेम जीवन है, द्वेष मृत्यु है।
  • जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते तब तक आप भागवान पर विश्वास नहीं कर सकते।
  • जो कुछ भी तुमको कमजोर बनाता है – शारीरिक, बौद्धिक या मानसिक उसे जहर की तरह त्याग दो।
  • विवेकानंद ने कहा था - चिंतन करो, चिंता नहीं, नए विचारों को जन्म दो।
  • हम जो बोते हैं वो काटते हैं। हम स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हैं।

विवेकानन्द का शिक्षा-दर्शन - Vivekananda's philosophy of education

स्वामी विवेकानंद उस समय प्रचलित मैकाले द्वारा प्रतिपादित और अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली के विरोधी थे, क्योंकि इस शिक्षा का उद्देश्य केवल बाबुओं की संख्या बढ़ाना था। वह एक ऐसी शिक्षा चाहते थे जिससे बच्चे का सर्वांगीण विकास हो सके। एक बच्चे की शिक्षा का उद्देश्य उसे आत्मनिर्भर बनाना और अपने पैरों पर खड़ा होना है। 

स्वामी विवेकानंद ने प्रचलित शिक्षा को education निषेधात्मक शिक्षा ’की संज्ञा दी है और कहा है कि आप एक ऐसे व्यक्ति पर विचार करते हैं जिसने कुछ परीक्षाएँ उत्तीर्ण की हैं और जो अच्छे भाषण दे सकते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि शिक्षा जनता के लिए एक संघर्ष है। स्वामी जी का मानना था की ऐसी शिक्षा से क्या फायदा जो बच्चों का भबिष्य निर्माण न कर सके। उनको आत्मनिर्भर न बना सके। 

इसलिए, स्वामी सैद्धांतिक शिक्षा के पक्ष में नहीं थे, वे व्यावहारिक शिक्षा को व्यक्ति के लिए उपयोगी मानते थे। किसी व्यक्ति की शिक्षा उसे भविष्य के लिए तैयार करती है, इसलिए शिक्षा में उन तत्वों का होना आवश्यक है जो उसके भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। स्वामी विवेकानंद के शब्दों में,

तुमको कार्य के सभी क्षेत्रों में व्यावहारिक बनना पड़ेगा। सिद्धान्तों के ढेरों ने सम्पूर्ण देश का विनाश कर दिया है।

स्वामी जी शिक्षा के माध्यम से धर्मनिरपेक्ष और पारलौकिक जीवन दोनों की तैयारी करना चाहते हैं। धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण से शिक्षा के बारे में, उन्होंने कहा है कि 'हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है, जो चरित्र का निर्माण करे, मन की शक्ति को बढ़ाए, बुद्धि का विकास करे और व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाए।' सांसारिक दृष्टिकोण से, उन्होंने कहा है कि 'शिक्षा मनुष्य की अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है'।

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स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा दर्शन के आधारभूत सिद्धान्त - Basic Principles of Swami Vivekananda's Education Philosophy

स्वामी विवेकानंद के शिक्षा दर्शन के मूल सिद्धांत निम्नलिखित हैं -

  1. शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे बच्चे का शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास हो सके।
  2. शिक्षा इस तरह से होनी चाहिए कि बच्चे का चरित्र निर्माण हो, मन विकसित हो, बुद्धि विकसित हो और बच्चा आत्मनिर्भर बने।
  3. लड़के और लड़कियों दोनों को समान शिक्षा दी जानी चाहिए।
  4. धार्मिक शिक्षा किताबों के बजाय आचरण और संस्कार के माध्यम से दी जानी चाहिए।
  5. अस्थायी और अन्य दोनों प्रकार के विषयों को पाठ्यक्रम में जगह दी जानी चाहिए।
  6. गुरु गृह में शिक्षा प्राप्त की जा सकती है।
  7. शिक्षक और छात्र का रिश्ता जितना संभव हो उतना करीब होना चाहिए।
  8. शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए और आम जनता में फैलाना चाहिए।
  9. देश की आर्थिक प्रगति के लिए तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए।
  10. मानव और राष्ट्रीय शिक्षा परिवार से शुरू होनी चाहिए।
  11. शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो शिक्षार्थी को जीवन संघर्ष से लड़ने का अधिकार प्रदान करे।
  12.   स्वामी विवेकानंद के अनुसार व्यक्ति को अपनी रुचि को महत्व देना चाहिए।

स्वामी विवेकानंद के अनमोल वचन - Precious words of Swami Vivekananda

  1. उठो जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता।
  2. एक विचार लें और इसे ही अपनी जिंदगी का एकमात्र विचार बना लें। इसी विचार के बारे में सोचे, सपना देखे और इसी विचार पर जिएं। आपके मस्तिष्क , दिमाग और रगों में यही एक विचार भर जाए। यही सफलता का रास्ता है। इसी तरह से बड़े बड़े आध्यात्मिक धर्म पुरुष बनते हैं।
  3. हर आत्मा ईश्वर से जुड़ी है, करना ये है कि हम इसकी दिव्यता को पहचाने अपने आप को अंदर या बाहर से सुधारकर। कर्म, पूजा, अंतर मन या जीवन दर्शन इनमें से किसी एक या सब से ऐसा किया जा सकता है और फिर अपने आपको खोल दें। यही सभी धर्मो का सारांश है। मंदिर, परंपराएं , किताबें या पढ़ाई ये सब इससे कम महत्वपूर्ण है।
  4. पहले हर अच्छी बात का मजाक बनता है फिर विरोध होता है और फिर उसे स्वीकार लिया जाता है।
  5. एक समय में एक काम करो और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमे डाल दो और बाकि सब कुछ भूल जाओ।
  6. एक अच्छे चरित्र का निर्माण हजारो बार ठोकर खाने के बाद ही होता है।
  7. खुद को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है।
  8. सत्य को हजार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी वह एक सत्य ही होगा।
  9. शक्ति जीवन है, निर्बलता मृत्यु है। विस्तार जीवन है, संकुचन मृत्यु है। प्रेम जीवन है, द्वेष मृत्यु है।
  10. विश्व एक विशाल व्यायामशाला है जहाँ हम खुद को मजबूत बनाने के लिए आते हैं।
  11. बाहरी स्वभाव केवल अंदरूनी स्वभाव का बड़ा रूप है।
  12. जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते तब तक आप भागवान पर विश्वास नहीं कर सकते।
  13. जो कुछ भी तुमको कमजोर बनाता है – शारीरिक, बौद्धिक या मानसिक उसे जहर की तरह त्याग दो।
  14. हम जो बोते हैं वो काटते हैं। हम स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हैं।
  15. विवेकानंद ने कहा था - चिंतन करो, चिंता नहीं, नए विचारों को जन्म दो।

 स्वामी विवेकानंद का अमेरिका के शिकागो में भाषण - Swami Vivekananda's speech in Chicago, America in hindi

स्वामी विवेकानंद ने 11 सितंबर, 1893 को अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में जो भाषण दिया था, वह युगों-युगों तक गूंजता रहेगा। आज स्वामीजी के भाषण को 125 साल पूरे हो रहे हैं। शिकागो में भाषण की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार है : -

मेरे अमरीकी बहनों और भाइयों!

आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया हैं उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा हैं। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ; धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ; और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूँ।

मैं इस मंच पर से बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बतलाया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृत- दोनों की ही शिक्षा दी हैं।

हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते वरन समस्त धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता हैं कि हमने अपने वक्ष में उन यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था। ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने महान जरथुष्ट जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है। भाईयो मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियाँ सुनाता हूँ जिसकी आवृति मैं बचपन से कर रहा हूँ और जिसकी आवृति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं ।

रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्। नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥

अर्थात जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न-भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।

यह सभा, जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है स्वतः ही गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत के प्रति उसकी घोषणा करती है।

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

अर्थात जो कोई मेरी ओर आता है-चाहे किसी प्रकार से हो-मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं।

साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं व उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को ध्वस्त करती हुई पूरे के पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं। यदि ये वीभत्स दानवी शक्तियाँ न होतीं तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता। पर अब उनका समय आ गया हैं और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टा ध्वनि हुई है वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होनेवाले सभी उत्पीड़नों का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्पारिक कटुता का मृत्यु निनाद सिद्ध हो।

स्वामी विवेकानन्द के जीवन की महत्त्वपूर्ण तिथियाँ - Important dates of the life of Swami Vivekananda

  • 12 जनवरी 1863 - कलकत्ता में जन्म
  • 1879 - प्रेसीडेंसी कॉलेज कलकत्ता में प्रवेश
  • 1880 - जनरल असेम्बली इंस्टीट्यूशन में प्रवेश
  • नवम्बर 1881 - रामकृष्ण परमहंस से प्रथम भेंट
  • 1882-86 - रामकृष्ण परमहंस से सम्बद्ध
  • 1884 - स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण; पिता का स्वर्गवास
  • 1885 - रामकृष्ण परमहंस की अन्तिम बीमारी
  • 16 अगस्त 1886 - रामकृष्ण परमहंस का निधन
  • 1886 - वराहनगर मठ की स्थापना
  • अन्य सन्यासियों के साथ स्वामी विवेकानन्द ( 1887, बड़ानगर )
  • जनवरी 1887 - वड़ानगर मठ में औपचारिक सन्यास
  • 1890-93 - परिव्राजक के रूप में भारत-भ्रमण
  • 25 दिसम्बर 1892 - कन्याकुमारी में
  • 13 फ़रवरी 1893 - प्रथम सार्वजनिक व्याख्यान सिकन्दराबाद में
  • 31 मई 1893 - मुम्बई से अमरीका रवाना
  • 25 जुलाई 1893 - वैंकूवर, कनाडा पहुँचे
  • 30 जुलाई 1893 - शिकागो आगमन
  • अगस्त 1893 - हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रो॰ जॉन राइट से भेंट
  • 11 सितम्बर 1893 - विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में प्रथम व्याख्यान
  • 27 सितम्बर 1893 - विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में अन्तिम व्याख्यान
  • 16 मई 1894 - हार्वर्ड विश्वविद्यालय में संभाषण
  • नवंबर 1894 - न्यूयॉर्क में वेदान्त समिति की स्थापना
  • जनवरी 1895 - न्यूयॉर्क में धार्मिक कक्षाओं का संचालन आरम्भ
  • अगस्त 1895 - पेरिस में
  • अक्टूबर 1895 - लन्दन में व्याख्यान
  • 6 दिसम्बर 1895 - वापस न्यूयॉर्क
  • 22-25 मार्च 1896 - फिर लन्दन
  • मई-जुलाई 1896 - हार्वर्ड विश्वविद्यालय में व्याख्यान
  • 15 अप्रैल 1896 - वापस लन्दन
  • मई-जुलाई 1896 - लंदन में धार्मिक कक्षाएँ
  • 28 मई 1896 - ऑक्सफोर्ड में मैक्समूलर से भेंट
  • 30 दिसम्बर 1896 - नेपाल से भारत की ओर रवाना
  • 15 जनवरी 1897 - कोलम्बो, श्रीलंका आगमन
  • जनवरी, 1897 - रामनाथपुरम् (रामेश्वरम) में जोरदार स्वागत एवं भाषण
  • 6-15 फ़रवरी 1897 - मद्रास में
  • 19 फ़रवरी 1897 - कलकत्ता आगमन
  • 1 मई 1897 - रामकृष्ण मिशन की स्थापना
  • मई-दिसम्बर 1897 - उत्तर भारत की यात्रा
  • जनवरी 1898 - कलकत्ता वापसी
  • 19 मार्च 1899 - मायावती में अद्वैत आश्रम की स्थापना
  • 20 जून 1899 - पश्चिमी देशों की दूसरी यात्रा
  • 31 जुलाई 1899 - न्यूयॉर्क आगमन
  • 22 फ़रवरी 1900 - सैन फ्रांसिस्को में वेदान्त समिति की स्थापना
  • जून 1900 - न्यूयॉर्क में अन्तिम कक्षा
  • 26 जुलाई 1900 - योरोप रवाना
  • 24 अक्टूबर 1900 - विएना, हंगरी, कुस्तुनतुनिया, ग्रीस, मिस्र आदि देशों की यात्रा
  • 26 नवम्बर 1900 - भारत रवाना
  • 9 दिसम्बर 1900 - बेलूर मठ आगमन
  • 10 जनवरी 1901 - मायावती की यात्रा
  • मार्च-मई 1901 - पूर्वी बंगाल और असम की तीर्थयात्रा
  • जनवरी-फरवरी 1902 - बोध गया और वाराणसी की यात्रा
  • मार्च 1902 - बेलूर मठ में वापसी
  • 4 जुलाई 1902 - महासमाधि

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