होली का त्यौहार

जानिये हिन्दू धर्म में क्यों खास है होली का त्यौहार

होली का त्यौहार एकदम रंगारंग त्यौहार है। होली के त्यौहार बाले दिन सभी हिन्दू भाई बहन सुबह होलिका दहन के बाद एक दूसरे के गुलाल लगाते हैं। और एक दूसरे को जौ की बाल देकर सभी हिन्दू भाई बहन गले मिलते हैं। इस दिन सभी लोग आपस में दुश्मनी को भूलकर एक दूसरे के गले मिलते हैं। होली के त्यौहार पर एक दूसरे को रंग लगाते हैं। इस बजह से होली के त्यौहार को रंगों का त्यौहार भी कहा जाता है। होली के त्यौहार को भारत के आलावा भी काफी देशों में मनाया जाता है। बैसे तो सनातन संस्कृति को विदेशी लोग भी काफी तेजी से अपना रहे हैं। साथ ही वे विदेशों में रहकर भी हिन्दू धर्म के सभी त्यौहारों को पूरी श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाते हैं।

"होली का त्यौहार" क्यों मनाया जाता है।

हिन्दू धर्म में आज भी बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जो होलिका दहन के बारे में नहीं जानते, कि होली का त्यौहार क्यों मनाया जाता है। इसके पीछे क्या इतिहास रहा होगा ? आज की इस पोस्ट में हम होली का त्यौहार के बारे में जानेंगे।

होलिका दहन क्यों किया जाता है ?

दिति के दो पुत्र हिरण्यकश्यप और हिरणाक्ष थे। ये दोनों ही बहुत बड़े राक्षस थे। जिन्होंने पूरी पृथ्वी को प्रताणित कर रखा था। जब पृथ्वी पर इन दोनों राक्षस हिरण्यकश्यप और हिरणाक्ष का अत्याचार चर्म पर पहुंच गया। तब भगवान् विष्णु ने बारह रूप धारण करके हिरणाक्ष का बध कर दिया था। भाई के मारे जाने के बाद हिरण्यकश्यप की भगवान् विष्णु के प्रति शत्रुता बढ़ गयी।

हिरण्यकश्यप का एक बेटा था, जिसका नाम प्रह्लाद था। प्रह्लाद बचपन से ही भगवान् विष्णु का परम भक्त था। अपने बेटे प्रह्लाद को विष्णुभक्त देखकर हिरणाकश्यप अपने बेटे प्रह्लाद से दुश्मन जैसा व्यवहार करने लगा। हिरणाकश्यप प्रह्लाद को प्रताणित करने लगा। उसने प्रह्लाद को कभी ऊँचे पर्वतों से नीचे गिरवाया, तो कभी सर्पों के साथ सर्पगृह में छोड़ दिया। लेकिन प्रह्लाद भगवान् विष्णु के परम भक्त थे इसलिए भक्त प्रह्लाद को कुछ भी असर नहीं पढ़ा।

अंत में जब हिरण्यकश्यप जब प्रह्लाद को मारने के सारे तरीके अपना चुका था। तब हिरण्यकश्यप की बहन होलिका ने प्रह्लाद को मारने का एक नया तरीका बताया। होलिका को अग्नि देव से बरदान प्राप्त था। कि उसे अग्नि कोई हानि नहीं होगी। अतः होलिका को आग से कोई छति नहीं पहुँचती थी। होलिका प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठ गयी। आग में बैठने के बाद भक्त प्रह्लाद ने "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का उच्चारण करते हुए भगवान् विष्णु को याद किया। देखते ही देखते थोड़ी ही देर में होलिका जलकर राख हो गयी और भक्त प्रह्लाद को कोई परेशानी नहीं हुयी। होलिका के जलने पर बहां पर जो संत प्रवृत्ति के लोग थे, उन्हें इस होलिका के जलकर मर जाने से ख़ुशी हुयी थी। तभी से होलिका दहन की शुरुआत हुयी थी। उस दिन बुराई पर अच्छाई की भी जीत हुयी थी। इसी बजह से लोग एक दूसरे को गुलाल लगते है, मिठाइयां बांटते हैं, और एक दूसरे गले लगते हैं।

मथुरा और बृन्दावन की होली

मथुरा और वृंदावन में होली महोत्सव एक बहुत प्रसिद्ध त्योहार है। भारत के अन्य क्षेत्रों में रहने वाले कुछ अति उत्साही लोग विशेष रूप से होली के त्योहार का गवाह बनने के लिए मथुरा और वृंदावन में इकट्ठा होते हैं। मथुरा और वृंदावन महान भूमि हैं जहाँ भगवान कृष्ण ने जन्म लिया और कई गतिविधियाँ कीं। होली उनमें से एक है। यह माना जाता है, कि होली का त्योहार राधा और कृष्ण के समय से शुरू हुआ था । दोनों जगह राधा और कृष्ण शैली की होली समारोह के लिए बहुत प्रसिद्ध हैं। मथुरा में, लोग बहुत सारी मज़ेदार गतिविधियों के साथ होली मनाते हैं।

होली का त्योहार उनके लिए प्यार और भक्ति का महत्व रखता है, जहां अनुभव और देखने के लिए बहुत प्यार है। यह त्यौहार पूरे एक सप्ताह तक रहता है, जिसमें भारत के कोने-कोने से लोग आते हैं। वृंदावन में एक बांके-बिहारी मंदिर है जहां यह भव्य समारोह मनाया जाता है। मथुरा के पास होली मनाने का एक अन्य स्थान ब्रज में गुलाल-कुंड है, जो माउंट गोवर्धन के पास एक झील है। होली के त्योहार का आनंद लेने के लिए बड़े पैमाने पर एक कृष्ण-लीला नाटक का आयोजन किया जाता है ।

बरसाने में होली लठमार क्यों मानते हैं ?

बरसाना में हर साल लोग लट्ठमार होली मनाते हैं, जो बहुत आकर्षक है। होली के त्योहार को देखने के लिए संबंधित क्षेत्रों के लोग बरसाने और नंदगांव आते हैं। बरसाना उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले का एक शहर है। लाठमार होली लाठी के साथ एक होली का त्योहार है जिसमें महिलाएं पुरुषों को लाठी से मारती हैं। ऐसा माना जाता है कि छोटी कृष्णा बरसाना में होली के दिन राधा को देखने के लिए आई थी, जहाँ उन्होंने उसे और उसके दोस्तों को छेड़ा था और बदले में उसे भी उसके द्वारा ले जाया गया था। तब से, बारसाने और नंदगाँव में लोग लट्ठमार होली नामक लाठी के उपयोग के साथ होली मनाते हैं।

बरसाने के राधा रानी मंदिर में लट्ठमार होली मनाने के लिए आसपास के क्षेत्रों के हजारों लोग एक साथ शामिल होते हैं। "वे होली के गीत भी गाते हैं और श्री राधे और श्री कृष्ण का पाठ करते हैं। हर साल नंदगाँव के गोपाल या चरवाहे बरसाने की गोपियों या मादा चरवाहों के साथ होली खेलते हैं और बरसाने की गोपियाँ या नंदगाँव की गोपियाँ या मादा चरवाहे एक साथ होली खेलते हैं। कुछ महिलाओं का ध्यान आकर्षित करने के लिए पुरुषों द्वारा समूह लेखन गाया जाता है, बदले में महिलाएं आक्रामक हो जाती हैं और पुरुषों को लाठी से मारती हैं। यहां पर भांग के रूप में कोल्ड ड्रिंक या कोल्ड ड्रिंक की परंपरा है।

होली के त्यौहार का इतिहास और महत्व

होली का त्योहार प्राचीन काल से अपनी सांस्कृतिक और पारंपरिक मान्यताओं के कारण मनाया जाता रहा है। इसका उल्लेख भारत की पवित्र किताबों में किया गया है, जैसे पुराण, दासकुमार चरित, संस्कृत नाटक, रत्नावली और कई और। होली के इस अनुष्ठान पर, लोग गलियों, पार्कों, सामुदायिक केंद्रों और मंदिरों के आसपास के क्षेत्रों में होलिका दहन की रस्म के लिए लकड़ी और अन्य ज्वलनशील पदार्थों के ढेर बनाने लगते हैं।

होली के आते ही लोग घर पर ही साफ-सफाई, धुलाई, गुझिया, मठिया, मिठाइयाँ, चिप्स, मालपुआ, आदि और कई अन्य चीजें तैयार करने लगते हैं। भारत भर में हिंदुओं के लिए होली एक बहुत बड़ा त्योहार है, जो ईसा से पहले कई सदियों से मौजूद है। इससे पहले, होली का त्योहार विवाहित महिलाओं द्वारा अपने परिवार की भलाई के लिए पूर्णिमा की पूजा करके मनाया जाता था। होली हिंदुओं के लिए एक सांस्कृतिक, धार्मिक और पारंपरिक त्योहार है। होली शब्द "होलिका" से लिया गया है। होली का त्योहार विशेष रूप से भारत के लोगों द्वारा मनाया जाता है, होली महोत्सव का पौराणिक महत्व इस त्योहार से जुड़ी ऐतिहासिक किंवदंतियों के अंतर्गत आता है।

होली के त्यौहार का सांस्कृतिक महत्त्व

होली के त्योहार को मनाने के लिए लोगों में एक मजबूत सांस्कृतिक विश्वास है। होली का त्योहार मनाने के पीछे विभिन्न कहानियों में विश्वास और लोगों की बुराई पर सच्चाई की जीत है। लोगों का मानना है कि भगवान हमेशा अपने प्रियजनों और सच्चे भक्तों को अपने बड़े हाथों में रखते हैं। वे उन्हें बुरी ताकतों से कभी नुकसान नहीं होने देते। यहां तक कि लोग होलिका दहन के दौरान होलिका की पूजा करते हैं और अपने सभी पापों और समस्याओं को जलाते हैं और बदले में बहुत खुशी और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं। होली का त्यौहार मनाने के पीछे एक और सांस्कृतिक मान्यता है।

होली के त्यौहार का जैविक महत्व

होली का त्यौहार स्वयं एक जैविक महत्व रखता है। यह होली का त्यौहार बहुत मज़ा और मस्ती लाता है। होली का त्यौहार हमारे दिमाग और शरीर पर लाभकारी प्रभाव डालता है। होली के त्यौहार गर्मी के मौसम की शुरुआत और सर्दियों के मौसम के अंत में मनाया जाता है। अतः वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उचित समय है। जब लोग स्वाभाविक रूप से आलसी और थका हुआ महसूस करते हैं। तो, इस समय होली शरीर की शिथिलता का प्रतिकार करने के लिए बहुत सारी गतिविधियाँ और खुशियाँ लाती है। यह होली का त्यौहार रंग खेलने, स्वादिष्ट व्यंजन खाने तथा परिवार के बड़े लोगों से आशीर्वाद लेने से शरीर को पहले से बेहतर महसूस कराता है।

होली के त्योहार पर प्राचीन काल से ही होलिका दहन की परंपरा रही है। वैज्ञानिक रूप से यह पर्यावरण को सुरक्षित और स्वच्छ बनाता है, क्योंकि होली के समय सर्दी और वसंत ऋतु के बैक्टीरिया जन्म लेते है। यह समय सर्दी के बैक्टीरिआ के विकास के लिए आवश्यक वातावरण प्रदान करता है। हमारे देश भारत में होलिका दहन की प्रक्रिया से वातावरण का तापमान करीब 145 डिग्री फ़ारेनहाइट तक बढ़ जाता है। जिससे बैक्टीरिया और अन्य हानिकारक कीट मर जाते है।

साथ ही लोग परिक्रमा के रूप में जानी जाने वाली होलिका के चारों ओर एक घेरा बनाते है, जो उनके शरीर के जीवाणुओं को मारने में मदद करता है। होलिका पूरी तरह से जल जाने के बाद, लोग अपने माथे पर इसकी राख (जिसे विभूति भी कहते हैं) के साथ चंदन और नए आम के पत्तों का मिश्रण लगाते हैं, जो उनके स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में मदद करता है। है। इस त्यौहार पर रंग खेलने के अपने फायदे और महत्व भी हैं। यह शरीर और मन के स्वास्थ्य को बढ़ाता है। घर के वातावरण में, साथ ही मकड़ियों, मच्छरों या अन्य लोगों को कीड़ों से छुटकारा पाने के लिए कुछ सकारात्मक ऊर्जा की अनुमति देने के लिए घरों को साफ और स्वच्छ बनाने की परंपरा है।

होली के त्यौहार का सामाजिक महत्व

होली का त्यौहार सामाजिक महत्व भी रखता है, यह पूरे हिन्दू समाज में रहने वाले लोगों के लिए एक खुशी की लहार लाता है। होली का त्यौहार सभी समस्याओं को दूर कर देता है। और साथ ही लोगों को करीब भी लाता है, सभी लोगों के सामाजिक बंधन को मजबूत करता है। होली का त्यौहार दुश्मनों को भी दोस्त बनाता है और साथ ही जाति, उम्र और धर्म जैसे - सभी भेदभावों को दूर करता है। एक-दूसरे के लिए अपना प्यार और स्नेह दिखाने के लिए, वे अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को उपहार, मिठाई और ग्रीटिंग कार्ड देते हैं। त्योहार रिश्तों को पुनर्जीवित और मजबूत करने के लिए एक टॉनिक के रूप में कार्य करता है, जो एक दूसरे को एक महान भावनात्मक बंधन में बांधते हैं।

2021 में होली कब मनाई जाएगी

सन 2021 में होली का त्यौहार 28 मार्च दिन रविवार को हर वर्ष की तरह देश विदेशों में रहने वाले सभी भारतीय पूरी धूमधाम के साथ मनाएंगे।



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