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सोमवार व्रत कथा - Somvar Vrat Katha In Hindi

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वैसे तो श्रावण मास के प्रत्येक दिन को पवित्र माना जाता है, लेकिन सोमवार को विशेष पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यता है कि श्रावण मास में समुद्र मंथन से निकले हलाहल पेय का सेवन सोमवार को ही शिव ने किया था। शिव के सिर पर सोम (चंद्रमा) है। पहले सोमवार को हर घर में उपवास और पूजा की तैयारी होती है।

कैसे रखें सोमवारी व्रत

सोमवार व्रत पूजा विधि - Monday Vrat Puja Method

शास्त्रों के अनुसार यह व्रत सोमवार के दिन किया जाता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने का विधान है। इस व्रत को करने के लिए शिव पूजा के बाद सोमवार व्रत की कथा सुनना आवश्यक है। व्रत करने वाले व्यक्ति को दिन में एक बार भोजन करना चाहिए।

  • सोमवार को ब्रह्म मुहूर्त में सोकर उठें।
  • पूरे घर की सफाई कर स्नानादि से निवृत्त हो जाएं।
  • गंगा जल या पवित्र जल पूरे घर में छिड़कें।
  • घर में ही किसी पवित्र स्थान पर भगवान शिव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।

पूरी पूजन तैयारी के बाद निम्न मंत्र से संकल्प लें -

'मम क्षेमस्थैर्यविजयारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं सोमवार व्रतं करिष्ये'

इसके पश्चात निम्न मंत्र से ध्यान करें -

'ध्यायेन्नित्यंमहेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलांग परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्‌।
पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्‌॥'

ध्यान के पश्चात 'ॐ नमः शिवाय' से शिवजी का तथा 'ॐ नमः शिवाय' से पार्वतीजी का षोडशोपचार पूजन करें।

  • पूजन के पश्चात व्रत कथा सुनें।
  • तत्पश्चात आरती कर प्रसाद वितरण करें।
  • इसके बाद भोजन या फलाहार ग्रहण करें।

सोमवार व्रत कथा - Monday fast story

प्राचीन काल में एक साहूकार था जो भगवान शिव का भक्त था। उसके पास धन की कोई कमी नहीं थी, लेकिन संतान न होने के कारण वह चिंतित रहता था और इसी इच्छा से वह प्रतिदिन शिव के मंदिर में दीपक जलाकर उसकी पूजा करता था। उनकी भक्ति देखकर एक दिन माता पार्वती ने शिव से कहा कि भगवान, यह साहूकार आपका अनन्य भक्त है। उसकी इच्छा पूरी करो। शिव ने कहा कि हे पार्वती, इस साहूकार का कोई पुत्र नहीं है, जिससे वह दुखी रहता है।

माता पार्वती ने आग्रह किया कि, हे भगवान, कृपया उन्हें पुत्र रत्न का वरदान दें। तब भोलेनाथ ने कहा कि हे पार्वती, उसके भाग्य में पुत्र का योग नहीं है। ऐसे में यदि उसे पुत्र प्राप्ति का वरदान भी मिल जाए तो उसका पुत्र केवल 12 वर्ष ही जीवित रहेगा। यह सुनकर भी माता पार्वती ने भगवान शिव से साहूकार को पुत्र का वरदान देने का आग्रह किया। भोलेनाथ ने बार-बार अपनी मां को बताकर साहूकार को पुत्र का वरदान दिया। लेकिन साथ ही यह भी बताया गया कि बेटा सिर्फ 12 साल ही जीवित रहेगा।

साहूकार ने सारी बात सुन ली, इसलिए वह न तो खुश हुआ और न ही दुखी। फिर भी वे पहले की तरह भोलेनाथ की पूजा करते रहे। भगवान शिव की कृपा से साहूकार को एक सुंदर संतान की प्राप्ति हुई। परिवार में बहुत खुशी थी लेकिन साहूकार ने बच्चे की 12 साल की उम्र किसी को नहीं बताई। जब बच्चा 11 साल का हो गया, तो एक दिन साहूकार की सेठानी ने बच्चे से शादी करने की इच्छा व्यक्त की। तब साहूकार ने कहा कि वह अब लड़के को पढ़ने के लिए काशीजी भेज देगा।

साहूकार ने लड़के के मामा को बुलाकर कहा कि उसे पढ़ने के लिए काशी ले जाओ और जहाँ भी वह रास्ते में रुके और ब्राह्मणों को भोजन कराये वहाँ यज्ञ करके ही आगे बढ़े। साहूकार के आदेश के बाद, बच्चे के मामा ने भी ऐसा ही किया। रास्ते में आगे बढ़ते हुए दोनों एक ऐसी जगह पहुंचे जहां राजकुमारी की शादी हो रही थी। जिससे राजकुमारी का विवाह होना था वह एक आंख से काना था। लड़के के पिता की नज़र एक बहुत ही सुन्दर साहूकार के बेटे पर पड़ी, तो उसके मन में आया कि क्यों न उसे घोड़ी पर बिठाकर उसकी शादी का काम पूरा किया जाए। तो उसने साहूकार के बेटे के मामा से बात की और कहा कि बदले में वह बहुत सारा पैसा देगा जिस पर वह सहमत हो गया।

इसके बाद साहूकार का बेटा शादी की वेदी पर बैठ गया। और जब विवाह हो गया तो शादी के बाद विदाई से पहले राजकुमारी की चुनरी पर लिखा हुआ था कि तेरा विवाह तो मेरे साथ हुआ लेकिन जिस राजकुमार के साथ तुझे भेजेंगे वह तो एक आंख का काना है। जब राजकुमारी को यह अपनी चुनरी पर लिखा हुआ मिला, तो उसने राजकुमार के साथ जाने से इनकार कर दिया। बारात वापस लौट गई। उधर मामा और भांजे काशीजी पहुंच गये। 

एक दिन जब मामा ने यज्ञ किया। और काफी देर तक भांजा बाहर नहीं आया तो मामा ने अंदर जाकर देखा कि उसका भतीजा मर गया है। वह बहुत परेशान हो गया लेकिन सोचा कि अब रोना शुरू कर दिया तो ब्राह्मण चले जाएंगे, उसने यज्ञ का काम पूरा किया और फिर अपने भांजे के मर के दुःख में रोने लगा। उसी समय जब शिव और पार्वती वहां से जा रहे थे, तो माता पार्वती ने शिवाजी से पूछा, भगवान, कौन रो रहा है? तब उन्हें पता चला कि यह एक साहूकार का बेटा है, जिसकी उम्र महज 12 साल तक थी।

तब माता पार्वती कहती हैं कि हे प्रभु, इसे जीवित कर दो, अन्यथा इसके माता-पिता रोते हुए मर जाएंगे। माता पार्वती के बार-बार अनुरोध करने पर भोलेनाथ ने उसे जीवन दान दे दिया। लड़का ओम नमः शिवाय करते हुए उठा और दोनों मामा और भांजे ने भगवान को धन्यवाद दिया और अब दोनों अपने शहर लौटने लगे। वापस जाते समय वही शहर मिला जहाँ राजकुमारी ने उसे पहचान लिया, तब राजा ने साहूकार के बेटे के साथ राजकुमारी को बहुत सारे धन-धान्‍य के साथ विदा किया।

दूसरी ओर बच्चे के माता-पिता छत पर बैठे थे। उन्होंने यह प्रण लिया था कि यदि उनका पुत्र सकुशल नहीं लौटा तो वह छत से कूदकर अपनी जान दे देंगे । तभी लड़के के मामा आए और साहूकार के बेटे और बहू के आने की खबर सुनाई। दोनों इस खबर को सुनकर खुश हुए और अपने बेटे और बहू का स्वागत किया। भगवान शिव ने साहूकार को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा कि मैं आपकी पूजा से प्रसन्न हूं। इसी प्रकार जो कोई भी इस कथा को पढ़ता या सुनता है, उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और मनचाहा फल प्राप्त होता है।
 



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