सनातन धर्म

सनातन धर्म का इतिहास, क्या है सनातन धर्म ?

दोस्तों, सनातन धर्म और हिन्दू धर्म के बारे में बहुत सी बातें चर्चा में रहती है। जैसा की हम जानते है। कि हिन्दू धर्म सनातन धर्म का ही एक वैकल्पिक नाम है। हमारे दिमाग में एक प्रश्न हमेशा आता है। कि सनातन धर्म का नाम परिवर्तित होकर हिन्दू धर्म कैसे हुआ। कुछ इतिहासकारों का कहना है। कि जब अंग्रेजों ने विभिन्न धर्मों के मानने बाले लोगों का तुलनात्मक अध्ययन किया था। तब सनातन शब्द से अपरिचित होने के कारन उन्होंने सनातन धर्म को हिन्दू धर्म का नाम दे दिया था। वैसे तो इस सम्बन्ध में विद्वानों के अलग अलग मत है।

सनातन का अर्थ "शाश्वत" होता है। इसका मतलब है की जो सदा के लिए सत्य हो। जैसे - ईश्वर ही सत्य है ।, आत्मा ही सत्य है।, मोक्ष ही सत्य है। अर्थात जिसका न कोई आदि हो न ही कोई अंत। अर्थात जो अनादि काल से चला आ रहा हो। उसी सत्य को सनातन या शाश्वत कहा जाता है। इसी सत्य का मार्ग बताने बाले धर्म को सत्य सनातन धर्म कहते है।

इतिहासकारों के दृष्टिकोण के अनुसार सनातन धर्म का इतिहास लगभग 1960353110 साल पुराना है। सनातन धर्म विश्व के सभी धर्मों में श्रेष्ठ बताया गया है। और यह धर्म सभी धर्मो से पुराना धर्म है। पृथ्वी पर जितने भी धर्म है। उन सभी धर्मों की उत्पत्ति हिन्दू धर्म हिन्दू धर्म से ही हुई है। हिन्दू धर्म ( सनातन धर्म ) परमात्मा को साकार तथा निराकार दोनों ही रूप में मानता है। हिन्दू धर्म विश्व में तीसरा सबसे बड़ा धर्म माना जाता है। जनसँख्या के आधार पर देखें, तो हिन्दू धर्म के उपासकों की संख्या सर्वाधिक भारत देश में निवास करती है। और प्रतिशतता के आधार पर देखा जाए तो नेपाल में हिन्दू धर्म को मानने वाले लोगों की संख्या सबसे अधिक है। हिन्दू धर्म एक एकेश्वरवादी धर्म है। जिसमे वैसे तो कई देवी और देवताओं की पूजा की जाती है।

लेकिन समय समय पर हिन्दू धर्म में से कई और धर्म भी निकले। जिसके अनुसार कुछ पुरानी परम्पराओं का लोप होता चला गया। और नई परम्पराएं जुड़ती चली गयी। कुछ पुरानी परम्पराएं ज्यों की त्यों रही तो कुछ परम्पराएं में बदलाव भी हुए। हिन्दू धर्म से ही अन्य सभी धर्मों की उत्पत्ति हुयी है। इसलिए हिन्दू धर्म को सभी धर्मों में श्रेष्ठ माना गया है। हिन्दू धर्म की तुलना अन्य किसी धर्म से नहीं की जा सकती। हिन्दू धर्म समय समय पर अपने धर्म में बदलाव करता रहा है। हिन्दू धर्म विचारों से नहीं अपितु विवेक से विकसित हुआ है। जबकि अन्य सभी धर्म जैसे - मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, अपने विचारों तक ही सीमित है। इसलिए इसमें धार्मिक कट्टरता ज्यादा पाई जाती है।

वेदों की भूमिका ( महत्त्व )

वेदों की रचना परमपिता परमेश्वर ने श्रस्टि के आरम्भ में ही कर दी थी। वेदों का उद्देश्य मानव जीवन को समझना तथा उसे सही ढंग से जीने का था। वेद कोई कथा या कहानी ही नहीं है। वेदों में हर वह सम्पूर्ण मूल ज्ञान विद्धमान है। जिससे हमारे इस मानव शरीर की रचना हुई है। जैसे - मैं कौन हूँ, मुझे क्या करना है, मैं कहाँ से आया हूँ, आत्मा क्या है, परमात्मा क्या है, मेरा शरीर तो यही रहेगा पर आत्मा कहाँ जायेगी, मेरा इस जीवन का उद्देश्य क्या है, मुझे यहाँ क्यूँ भेजा गया, आदि। यानी हर छोटे से कण से लेकर किसी भी अन्य ग्रहों तक के ज्ञान का समावेश हमें वेदों में देखने को मिलता है। रामायण, महाभारत, तो ऐसी ऐतिहासिक घटनाएं है। जिससे हमें सीख लेनी चाहिए। और सत्पुरुषों के दिखाए मार्ग पर चलना चाहिए।

वेदों के प्रकार

वेद चार प्रकार होते है। ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद

ऋग्वेद

ऋग्वेद का निर्माण वेदों में सबसे पहले हुआ था। ऋग्वेद पद्यात्मक है। ऋग्वेद में 10 मंडल और 1028 सूक्त हैं। तथा 11000 मंत्र और 5 शाखाएं हैं। शाकल्प, वास्कल, अश्वलायन, शांखायन, मंडूकायन। ऋग्वेद के दशम सूक्त औषधियों के बारे में वर्णित है। इस सूक्त में औषधियों की संख्या लगभग 125 निर्दिष्ट की गयी है। जो 107 स्थानों पर पायी जाती है। ऋग्वेद में च्यवन ऋषि को पुनः जवान कर देने की औषधि का वर्णन भी दिया गया है। और किस औषधि से कौन से रोग का निवारण होता है, इसके बारे में भी वर्णन समविष्ट है। ऋग्वेद में जल चिकित्सा, सौर चिकित्सा, वायु चिकित्सा, मानक चिकित्सा, एवं हवन द्वारा चिकित्सा का समावेश है।

सामवेद

सामवेद गीतात्मक है। इसमें गेय छंदों की अधिकता है। सामवेद में 1824 मंत्र है। 75 मन्त्रों को छोड़कर शेष सब मंत्र ऋग्वेद से ही संकलित है। यह वेद संगीत शास्त्र का मूल है। सामवेद के मंत्र भी गीतामत्मक है यज्ञ में इन मन्त्रों को गीत के रूप में ही गया जाता है। सामवेद में तीन मुख्य शाखाएं हैं। 75 ऋचाएं हैं। इस वेद में मुख्यतः संगीत शास्त्र का वर्णन किया गया है। इसी वेद से हमें संगीत का ज्ञान हुआ था।

यजुर्वेद

यजुर्वेद हमें यज्ञ के महत्व के वारे में जानकारी देता है। इस वेद में गद्य मंत्र है। जो यज्ञ आदि के काम में आते है। यह वेद मुख्यतः क्षत्रियों के लिए होता है। इस वेद से किसी भी यज्ञ को सफलतापूर्वक सिद्ध किया जा सकता है। जिसका प्रभाव वहुत शक्तिशाली होता है।

अथर्ववेद

अथर्ववेद में चमत्कार, आरोग्य, यज्ञ, जादू टोने, सभी तंत्र क्रियाओं के लिये मन्त्र हैं, यह वेद मुख्यतः व्यापार करने वाले लोगों के लिये होता है । अथर्ववेद में 20 काण्ड हैं । इसमें में आठ खण्ड आते हैं जिनमें भेषज वेद एवं धातु वेद ये दो नाम स्पष्ट प्राप्त हैं।



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